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धर्मसम्मत है धर्मसंसद् 1008 की अवधारणा

नारायणोपनिषद् कहता है की जब जनता को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है तो वे धर्मनिष्ठ अर्थात् धर्म को जीने और जानने वालों की ओर जाती है ।
लोके धर्मिष्ठं प्रजाः उपसर्पन्ति । ऐसे में अपनी और अपेक्षा रख कर आई जनता का मार्गदर्शन करना धर्म निश्चय व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है ।

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि क्या हर धर्मिष्ठ जनता के पूछे गए हर प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम होगा ?? उसे भी तो कुछ बिंदुओं पर ‘आपसी समझ’ बनाने की आवश्यकता होगी । इसीलिए एक धर्मिष्ठ को दूसरे धर्मिष्ठ के पास जाना होता है और परस्पर मिल बैठकर समस्या को समझना और समाधान निकालना होता है । भगवान शंकराचार्य जी ने भी सनातन धर्म के उद्धार के लिए चार आम्नाय पीठों की स्थापना की तो उन्होंने यह व्यवस्था दी कि ‘परस्परेण कर्तव्या ह्याचार्येण व्यवस्थितिः’ अर्थात् आचार्यगण परस्पर चर्चा कर व्यवस्था बना लेंगे । धर्मशास्त्रों में संतों के समवेत होकर धर्मविचार करने के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं ।

संसीदन्ति अस्याम् इस व्युत्पत्ति के सम् उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय करने से स्त्रीलिंग शब्द संसद् बनता है जिसका अर्थ अमरकोशकार ने ‘सभा’ किया है । महाकवि कालिदास ने रघुवंश 16/24 में तदद्भुतम संसदि रात्रिवृत्तं प्रातर्पद्विजेभ्तियो नृपतिः सशंस कहकर संसद् शब्द का प्रयोग किया है । अमरकोश में समज्या परिषद् गोष्ठी सभा समिति संसदः । अस्थानी क्लीबमास्थानम् स्त्रीनपुंसकयोः सदः कहकर समज्या, परिषद, गोष्ठी, सभा, समिति तथा संसद् को समानार्थक माना है । अमरकोश के अतिरिक्त शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यम्, शब्दसागर, आप्टे कोश तथा मोनियर विलियम आदि ने भी साथ बैठने को संसद कहा है । ससत्सुजाते पुरुषाधिकारे किरातार्जुनीयम् 3/5 छात्र संसदि धर्मकीर्ति । पंचतंत्र 16/24 अपह्नवेऽघमर्णस्य देहीऽत्युक्तस्य संसदि । मनुस्मृति 8/52 तथा विविक्तदेश सेवित्वमरतिर्जन संसदि भगवद्गीता 13/11 आदि स्थलों पर प्राचीन काल से ही संसद् शब्द का सभा के अर्थ में प्रयोग होता रहा है । इससे सिद्ध होता है कि धर्मसंसद् 1008 पूर्णतया शास्त्रीय अवधारणा पर अवस्थित है ।

 

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परम धर्मादेश

परम धर्मादेश

2018/11/25 09:00:00

Our Values

एक धर्मिष्ठ को दूसरे धर्मिष्ठ के पास जाना होता है और परस्पर मिल बैठकर समस्या को समझना और समाधान निकालना होता है ।

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25th, 26th & 27th Nov’18
Varanasi, U.P.

Our Mission

लोके धर्मिष्ठं प्रजाः उपसर्पन्ति । अपनी ओर अपेक्षा रख कर आई जनता का मार्गदर्शन करना धर्मनिष्ठ व्यक्ति का कर्तव्य है ।

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