परम धर्माधीश परिचय

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज जैसी दिव्य-विभूति का संक्षिप्त परिचय दिया जाना छोटी सी नाव लेकर सागर को पार करने जैसे दुःसाहसी चेष्टा है, जिसे महाकवि कालिदास ने उडुप-तीर्तिशा कहा है। पर उनके चरणों में समर्पित हम भक्तो के लिए और कोई चारा भी तो नहीं है कि हम आराध्य की लीलाओं का अनुचिंतन कर सके।

पूज्य महाराज श्री का जन्म संवत1980 के भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (तदनुसार २ सितम्बर 1924 ई.) के शुभ दिन भारत के हृदय स्थल माने जाने वाले मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में सनातन हिन्दू परंपरा का कुलीन ब्राह्मण परिवार में पिताश्री धनपति उपाध्याय एवं माताश्री गिरिजा देवी के यहाँ हुआ था। माता पिता ने विद्वानों के आग्रह पर इनका नाम पोथीराम रखा। पोथी अर्थात शास्त्र, मानो शास्त्रवतार हों। ऐसे संस्कारी परिवार में पूज्यश्री के संस्कारो को जागृत होने में देर न लगी और मात्र नौ वर्ष की कोमल वय में आपने गृह त्याग कर धर्म यात्राएं प्रारम्भ कर दी।

काशी आकर ब्रह्मलीन धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज एवं स्वामी महेश्वरानंद जी जैसे तल्लज विद्वानों से वेद – वेदाङ्ग, शास्त्र – पुराणेतिहास सहित स्मृति एवं न्याय ग्रंथो का अनुशीलन किया और अपनी प्रतिभा और विद्या के बल पर स्वल्पकाल में ही विद्वानों में अग्रणी बने।

ईसवी सन १९५० में ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी सही ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दंड सन्यास की दीक्षा लेकर आप ” स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती” के नाम से प्रसिद्द हुए।

पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज के ब्रह्मलीन हो जाने पर सं 1973 में द्वारिकापीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी अभिनव सच्चिनान्द तीर्थ जी महाराज एवं पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज, श्रृंगेरी पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी अभिनव विद्यातीर्थ जी महाराज के प्रतिनिधि सहित देश के तमाम संतो, विद्वानों द्वारा आप ज्योतिष्मठ पर विधिवत अभिषिक्त हुए और ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में हिंदू धर्म को अमूल्य संरक्षण देने लगे।